
05 मार्च 23, मुरादाबाद। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगााने और आमजन तक सभी सूचनाओं को पहुंचाने के लिए बनाए गए सूचना का अधिकार (आरटीआई) को सरकारी मशीनरी ने जनता के हथियार को मजाक बनाकर रख दिया है। बेहद हैरान करने वाला मामला बिहार से सामने आया है, जहां सूचना मांगने के नौ वर्ष बाद सुनवाई शुरू हुई और आवेदक को बीती 28 फरवरी को वर्चुअल कोर्ट में बुलाया गया। याद रहे कि आरटीआई में एक महीने के भीतर सूचनाएं देने का प्रावधान किया गया है।
सलीम बेग ने मांगी थी ये सूचनाएं
मुरादाबाद के भोजपुर क्षेत्र निवासी आरटीआई एक्टिविस्ट एवं रिसर्चर सलीम बेग ने तीन जून 14 को सूचना का अधिकार अधिनियम के माध्यम से बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग से चार बिन्दुओ की सूचनाएं मांगी थी। उन्होंने एक जून 09 से तीन जून14 तक की अवधि के दौरान बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग के परिक्षेत्र में हुए सांप्रदायिक दंगों की संख्या, साम्प्रदायिक दंगों में आयोग द्वारा की गई कार्यवाही, सूचना व आयोग द्वारा स्वयं टीम भेजकर जाँच कराई गई सूचना व जांच तथा दीगर माध्यम से कराई जांच की जानकारी मांगी थी। इसके अलावा राज्य अल्पसंख्यक आयोग द्वारा सच्चर समिति की सिफारिशों के प्रभावी क्रियान्वयन कराने हेतु की गयी कार्यवाही, आयोग मे सृजित पद एवं भरे पदों की संख्या की सूचना नाम, पदनाम, पते की सूचना व रिक्त पदों की सूचना मांगी गई थी। इसके आलावा आयोग मे अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के पद रिक्त होने की स्थिति में निस्तारित किये वादों की सूचनाएं मांगी गई थीं ।
त्रुटियां निकालते रहे आयोग अधिकारी
सलीम बेग के मुताबिक निर्धारित समय सीमा मं जन सूचना अधिकारी से सूचना नहीं मिलने पर वादी ने नियमानुसार वर्ष 14 में प्रथम राज्य अल्पसंख्यक आयोग पटना मे अपील दायर की थी। उसके बाद भी सूचना नहीं मिली तो द्वितीय अपील बिहार राज्य सूचना आयोग मे दायर की गई। बिहार राज्य सूचना आयोग के प्रेषित पत्र के अनुसार आयोग ने जुलाई 16 में द्वितीय अपील आवेदन की जाँच के दौरान अनेक त्रुटियां का उल्लेख करते हुए आयोग के प्रेषित पत्र में कहा गया है कि सलीम बेग के आवेदन पत्र में प्रथम अपील दायर करने संबंधी पावती नहीं है, साथ ही द्वितीय अपील शुल्क का भुगतान नहीं किया गया है। बिहार सूचना आयोग के निबंधक उपेंद्र कुमार ने 27 दिसंबर 22 को आवेदक को भेजे प्रपत्र में कहा कि राज्य सूचना आयोग ने वाद के तहत दायर मामले की द्वितीय अपील की समीक्षा के क्रम में त्रुटियां पाई हैं। आयोग के निबंन्धक उपेन्द्र कुमार ने वाद की सुनवाई हेतु सलीम बेग को प्रारंभिक सुनवाई के लिये राज्य मुख्य सूचना आयुक्त के न्यायालय में 28 फरवरी 23 को डिजिटल अदालत प्रणाली के माध्यम से उपस्थित होने को कहा था।

सरकार का आईना है आयोग का कामकाज
शोधकर्ता सलीम बेग का कहना है कि आठ-नौ साल के बाद वाद की सुनवाई के सम्बंध मे बिहार राज्य सूचना आयोग का नोटिस इतने लम्बे अरसे बाद मुझे मिलना आश्चर्यजनक ही नहीं चिन्ताजनक एवं भयभीत करने वाला है। उन्होंने हैरानी जताते हुए कहा कि अधिनियम में दी गई व्यवस्था के मुताबिक मुझे तीस दिन के अंदर जो सूचनाये मिल जानी चाहिये थी वह सूचनाएं मिलना तो दूर आयोग ही नौ साल बाद पहली सुनवाई की प्रक्रिया शुरू कर रहा हैे। यह बिहार राज्य सूचना आयोग के अस्तित्व और पूरे सूचना का अधिकार अधिनियम के वजूद पर व अधिनियम की प्रहरी राज्य व केंद्र सरकार के कामकाज पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। श्री बेग ने कहा कि बिहार राज्य सूचना आयोग का नौ साल बाद केस की पहली सुनवाई करना बिहार के पूरे सिस्टम का आईना है। उन्होंने कहा अब ऐसी सूचनाओ का क्या फायदा जो मुझे समय से नही मिलीं। सूचनाएं मुझे पहले मिल गई होती तो मुझे अपनी एक जनहित याचिका सुप्रीमकोर्ट से वापस नही लेनी पड़ती। उन्होंने कहा वर्ष 2015-16 मे उन्होंने देश के सभी राज्यों में राज्य व केंद्रीय अल्पसंख्यकों आयोगो के कामकाज पर सवालिया निशान लगाते हुए उन्हे माननीय उच्चतम न्यायालय मे जनहित याचिका दायर की थी।