ज़ोमैटो लिमिटेड आज भारतीय बाज़ार में एक ऐसा नाम बन चुका है जिसे किसी खास परिचय की ज़रूरत नहीं है। 2008 में जब दीपिंदर गोयल और पंकज चड्ढा ने ‘फूडीबे’ (Foodiebay) के नाम से दिल्ली-एनसीआर के रेस्टोरेंट्स के मेनू की स्कैन कॉपी दिखाने वाली एक वेबसाइट शुरू की थी, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह आगे चलकर एक क्रांति का रूप ले लेगी। 2010 में इसे ‘ज़ोमैटो’ के रूप में रीब्रांड किया गया और 2011 में इसके मोबाइल ऐप के लॉन्च ने इस इंडस्ट्री का गेम ही पलट दिया। आज गुड़गांव स्थित अपने मुख्यालय से ऑपरेट करते हुए यह कंपनी भारत के कोने-कोने के साथ-साथ यूएई, कतर, श्रीलंका, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में अपना मजबूत नेटवर्क बना चुकी है।
अपनी शुरुआत से लेकर अब तक, ज़ोमैटो ने एक पूरा इकोसिस्टम तैयार कर लिया है। अब यह सिर्फ खाना घर पहुँचाने वाली सर्विस नहीं है। रेस्टोरेंट खोजने, ऑनलाइन फूड ऑर्डर करने, वीकेंड पर टेबल बुक करने से लेकर रेस्टोरेंट्स के लिए पीओएस (POS) सिस्टम मैनेज करने तक, हर जगह इनकी मौजूदगी है। Zomato Pro जैसी सब्सक्रिप्शन सर्विस ने ग्राहकों को डिलीवरी फीस में छूट देकर अपनी तरफ और भी मज़बूती से खींचा है। इसका असरदार ब्रांड नाम, तेज़ डिलीवरी और एक बेहद वफादार कस्टमर बेस ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
लेकिन अब कहानी कंज्यूमर मार्केट से एक कदम आगे बढ़ चुकी है। ज़ोमैटो ने कॉर्पोरेट जगत की एक बड़ी सिरदर्दी का भी डिजिटल इलाज ढूँढ निकाला है। उन्होंने ‘ज़ोमैटो फॉर एंटरप्राइज’ के तहत ‘फूड रिइंबर्समेंट’ नाम से एक नया फीचर लॉन्च किया है। इसका सीधा सा मतलब है—कर्मचारियों के लिए बिल जमा करने और एचआर के चक्कर काटने का झंझट हमेशा के लिए खत्म। इसे प्रमोट करने के लिए कंपनी ने एक बड़ा ही मज़ेदार और चुटीला प्रिंट विज्ञापन निकाला, जिसकी हेडलाइन थी—”यह विज्ञापन आपके फूड रिइंबर्समेंट से भी जल्दी अप्रूव हो गया।” उन्होंने मज़ाकिया लहज़े में बताया कि इस क्रिएटिव को दो लीगल टीमों, एक सीईओ, दो ब्रांड मैनेजरों और एक बेहद नखरेबाज़ क्रिएटिव डायरेक्टर से पास कराने में कम वक्त लगा।
यह नया टूल सीधे तौर पर कंपनियों की एचआर और फाइनेंस टीमों के लिए डिज़ाइन किया गया है। अब मैनेजर एक डैशबोर्ड के ज़रिए अपने कर्मचारियों का रोज़ का मील बजट तय कर सकते हैं और कर्मचारी के ऑर्डर का सीधा बिल कंपनी के खाते में जाएगा। यानी कर्मचारी के लिए ज़ीरो आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च। ज़ोमैटो अब खुद को सिर्फ एक फूड-टेक कंपनी से एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर मार्केट के एक अहम खिलाड़ी के रूप में पोज़िशन कर रहा है, जहाँ ऑटोमेशन और वर्कफ्लो मैनेजमेंट सबसे बड़ी प्राथमिकता बन चुके हैं।
अगर हम इनके वित्तीय प्रदर्शन पर नज़र डालें, तो तस्वीर काफी दिलचस्प दिखाई देती है। शेयर बाज़ार में ज़ोमैटो का शेयर हाल ही में 199 रुपये के स्तर पर बंद हुआ था। वित्त वर्ष 2023-24 की चौथी तिमाही में कंपनी ने 175 करोड़ रुपये का कंसोलिडेटेड मुनाफा कमाया था, जो इनके सुधरते बिजनेस मॉडल का एक पक्का सबूत है। रेवेन्यू बढ़ रहा है, लेकिन लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी पर अभी भी लगातार काम करने की ज़रूरत है।
इस सर्विस सेक्टर के पूरे वित्तीय गणित और मार्केट ट्रेंड को गहराई से समझने के लिए हमें इसी डोमेन से जुड़ी एक और कंपनी, इटरनल लिमिटेड (NSE: ETERNALEQ), के ताज़ा आंकड़ों को भी देखना चाहिए। 2010 में निगमित यह कंपनी, जो एक स्मॉल कैप के रूप में जानी जाती है, फिलहाल 2,32,747.16 करोड़ रुपये के मार्केट कैप पर बैठी है। शेयर बाज़ार में इसका ताज़ा प्राइस 259.4 रुपये है, जिसमें 1.67% (करीब 4.25 रुपये) की बढ़त दर्ज की गई है।
31 मार्च 2026 को समाप्त हुई ताज़ा तिमाही के आंकड़ों के मुताबिक, इटरनल लिमिटेड ने 17,634.00 करोड़ रुपये की कुल संगठित आय (Total Income) रिपोर्ट की है। यह आंकड़ा पिछली तिमाही (दिसंबर 2025 के 16,663.00 करोड़) से 5.83% और पिछले साल की इसी तिमाही (मार्च 2025 के 6,201.00 करोड़) के मुकाबले 184.37% ज़्यादा है। इस भारी-भरकम टॉप-लाइन ग्रोथ के साथ, इस तिमाही में कंपनी का टैक्स चुकाने के बाद शुद्ध मुनाफा (PAT) 174.00 करोड़ रुपये दर्ज किया गया है, जो पिछली तिमाही के 102.00 करोड़ से लगभग 70.59% की शानदार छलांग है।
कंपनी का कुल खर्च 17,274.00 करोड़ रुपये और EBIT 360.00 करोड़ रुपये रहा है। हालांकि, गौर करने वाली बात यह है कि रेवेन्यू में भारी तेज़ी के बावजूद इनका शुद्ध मुनाफा मार्जिन अभी भी सिर्फ 0.99% और EBIT मार्जिन 2.04% पर है। कंपनी का बेसिक ईपीएस (EPS) महज़ 0.19 रुपये है। दिलचस्प बात यह भी है कि 31 मार्च 2026 तक कंपनी के बकाया शेयरों की कुल संख्या केवल 965 है। ये आंकड़े साफ तौर पर इस बात की ओर इशारा करते हैं कि फूड और सर्विस सेक्टर में स्केल तो तेज़ी से आ रहा है, लेकिन पतले मार्जिन के बीच मुनाफे को सस्टेन करना अभी भी एक कला है।
इन वित्तीय आंकड़ों और ज़ोमैटो के एंटरप्राइज सेक्टर में आक्रामक विस्तार से यह एकदम साफ है कि यह इंडस्ट्री अपने ट्रांसफॉर्मेशन के सबसे दिलचस्प दौर से गुज़र रही है। यह अब महज़ घर पर खाना मंगाने की सुविधा नहीं रही, बल्कि कंपनियों के रोज़मर्रा के फाइनेंस और ऑपरेशंस का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। बाज़ार का यह नया रूप उन कंपनियों के लिए सुनहरे मौके ला रहा है जो इनोवेशन के साथ-साथ अपने खर्चों को नियंत्रण में रखने की क्षमता रखती हैं।